लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए को भारी बहुमत मिला है और बीजेपी ने अकेले दम पर 300 सीटों का आंकड़ा पार कर लिया है.
यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहा है. ऐसा पहली बार हो रहा है कि पहली ग़ैर कांग्रेसी सरकार पूर्ण बहुमत से लगातार दूसरी बार देश की सत्ता पर काबिज़ होने जा रही है.
लेकिन इस चुनाव में आए नतीजों के क्या मायने हैं?
सी-वोटर्स के यशवंत देशमुख बताते हैं कि देश के सबसे बड़े चुनाव में ये ऐतिहासिक है जीत है.
बीजेपी को 67 फ़ीसदी के आसपास वोट मिले हैं. 90 करोड़ मतदाताओं में से 67 फ़ीसदी यानी 60 करोड़ ने एक पार्टी को वोट किया.
हमारे देश में स्प्लिट वोटिंग का तरीका अपनाया गया. ओडिशा जैसे राज्य में, जिसके लिए कहा जाता है कि बहुत पिछड़ा हुआ राज्य है और जहां साक्षरता दर भी कम है, वहां लोगों ने दो तरह के फ़ैसले किए हैं.
निम्न आय वर्ग ने बीजू जनता दल को वोट किया तो मध्यम और उच्च आय वर्ग के लोगों ने बीजेपी को वोट किया. इसके अलावा जिन राज्यों में तीन-चार महीने पहले ही बीजेपी बुरी तरह हारी थी, वहां लोगों ने ज़बरदस्त तरीके से बीजेपी को वोट दिया.
दिसम्बर में जब तीन राज्यों के एक्ज़िट पोल में ये बात कही जा रही थीं तो किसी को विश्वास नहीं हो रहा था.
ऐसा माना जाता है कि छह महीने के अंतराल में अगर विधानसभा और लोकसभा चुनाव हैं और विधानसभा में जो जीत जाता है तो छह महीने तो उसका हनीमून पीरियड ही होता है.
इसलिए छह महीने के अंदर जो भी चुनाव होगा वो ज़रूर रिपीट होता है. दिसम्बर में जब वो नतीजे आए थे तब भी हमने एक्ज़िट पोल में पूछा था कि अगर विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव साथ होते तो आप किसे वोट देते.
हमने तब कहा था कि विधानसभा चुनाव से लोकसभा चुनाव में पंद्रह फीसदी का वोट शिफ़्ट होगा और वही हुआ.
उत्तर प्रदेश के बारे में सबसे ज़्यादा बात हुई. वहां मोदी को हराने के लिए महागठबंधन बनाया गया, उसके फ़ेल होने की कई वजहें रहीं.
हमने एक्ज़िट पोल में कहा था कि बीजेपी को महागठबंधन से तीन फ़ीसदी वोट ज़्यादा मिल रहा है.
यहां कांटे की टक्कर इसलिए मानी जा रही थी क्योंकि राज्य में 10-12 सीटें जो शहरी सीटें हैं वहां बीजेपी का मार्जिन बहुत बड़ा हो रहा था.
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